श्री हनुमान बाहुक पाठ: अर्थ, लाभ और संपूर्ण लिरिक्स (Hanuman Bahuk Path in Hindi)

हनुमान बाहुक भगवान हनुमान जी का एक बहुत ही चमत्कारी और शक्तिशाली स्तोत्र (पाठ) है। इसकी रचना महाकवि संत तुलसीदास जी ने की थी। जब तुलसीदास जी को बुढ़ापे में हाथों और शरीर में असहनीय दर्द (वात रोग/जोड़ों का दर्द) हुआ, तब उन्होंने हनुमान जी की आराधना करके इस पाठ की रचना की थी। ऐसा माना जाता है कि इसके पाठ से शारीरिक पीड़ा और सभी प्रकार के संकट दूर हो जाते हैं।

श्री हनुमान बाहुक पाठ के मुख्य लाभ

  • शारीरिक कष्टों से मुक्ति: जोड़ों का दर्द, बदन दर्द, हड्डियों की तकलीफ और पुरानी बीमारियों में राहत पाने के लिए इसका पाठ अचूक माना जाता है।
  • ग्रह दोषों से रक्षा: यह पाठ शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या और राहु-केतु के बुरे प्रभावों से बचाता है। हमारे अन्य लेख में आप श्री राहु चालीसा के माध्यम से भी ग्रहों की शांति के उपाय जान सकते हैं।
  • भय और संकट नाश: इसे पढ़ने से मन का डर, नकारात्मक ऊर्जा और मानसिक तनाव दूर होता है।

पाठ करने की विधि (Vidhi aur Niyam)

  • नियम: सुबह स्नान करके साफ और स्वच्छ कपड़े पहनें।
  • स्थान: घर के मंदिर में हनुमान जी की मूर्ति या तस्वीर के सामने शुद्ध घी या सरसों के तेल का दीपक जलाएं।
  • संकल्प: हनुमान जी के सामने बैठकर अपने कष्टों या स्वास्थ्य लाभ की प्रार्थना करें।
  • दिन: वैसे तो इसे रोज़ पढ़ा जा सकता है, लेकिन मंगलवार और शनिवार से इसकी शुरुआत करना विशेष फलदायी होता है।

श्री हनुमान बाहुक संपूर्ण पाठ (Full Lyrics in Hindi)

श्री गणेशाय नमः

श्रीजानकीवल्लभो विजयते

श्रीमद्‌-गोस्वामी-तुलसीदास-कृत

छप्पय

सिंधु-तरन, सिय-सोच-हरन, रबि-बाल-बरन तनु ।

भुज बिसाल, मूरति कराल कालहुको काल जनु ॥

गहन-दहन-निरदहन लंक निःसंक, बंक-भुव ।

जातुधान-बलवान-मान-मद-दवन पवनसुव ।।

कह तुलसिदास सेवत सुलभ सेवक हित सन्तत निकट ।

गुन-गनत, नमत, सुमिरत, जपत समन सकल-संकट-विकट ।१।।

स्वर्न-सैल-संकास कोटि-रबि-तरुन-तेज-घन ।

उर बिसाल भुज-दंड चंड नख-बज बज्र-तन ॥।

पिग नयन, भृकुटी कराल रसना दसनानन ।

कपिस केस, करकस लंगूर, खल-दल बल भानन ॥।

कह तुलसिदास बस जासु उर मारुतसुत मूरति बिकट ।

संताप पाप तेहि पुरुष पहिं सपनेहुं नहिं आवत निकट ।॥२॥।

झूलना

पंचमुख-छमुख-भृगु मुख्य भट असुर सुर,

सर्व-सरि-समर समरत्थ सूरो ।

बकुरो बीर बिरुदैत बिरुदावली,

बेद बंदी बदत पैजपूरो ।।

जासु गुनगाथ रघुनाथ कह, जासुबल,

बिपुल-जल-भरित जग-जलधि झूरो ।

दुवन-दल-दमनको कौन तुलसीस है,

पवन को पूत रजपूत रुरो ।।३।।

घनाक्षरी

भानुसों पढ़न हनुमान गये भानु मन-

अनुमानि सिसु-केलि कियो फेरफार सो ।

पाछिले पगनि गम गगन मगन-मन,

क्रम को न भ्रम, कपि बालक बिहार सो ।।

कौतुक बिलोकि लोकपाल हरि हर बिधि,

लोचननि चकाचौंधी चित्तनि खभार सो।

बल कैंधौं बीर-रस धीरज कै, साहस कै,

तुलसी सरीर धरे सबनि को सार सो ।।४।।

भारत में पारथ के रथ केथू कपिराज,

गाज्यो सुनि कुरुराज दल हल बल भो ।

कल्यो द्रोन भीषम समीर सुत महाबीर,

बीर-रस-बारि-निधि जाको बल जल भो ॥।

बानर सुभाय बाल केलि भूमि भानु लागि,

फलंग फलांग हते घाटि नभतल भो ।

नाई-नाई माथ जोरि-जोरि हाथ जोधा जोहैं,

हनुमान देखे जगजीवन को फल भो ॥५॥

गो-पद पयोधि करि होलिका ज्यों लाई लंक,

निपट निसंक परपुर गलबल भो ।

द्रोन-सो पहार लियो ख्याल ही उखारि कर,

कंदुक-ज्यों कपि खेल बेल कैसो फल भो ।।

संकट समाज असमंजस भो रामराज,

काज जुग पूगनि को करतल पल भो ।

साहसी समत्थ तुलसी को नाह जाकी बांह,

लोकपाल पालन को फिर थिर थल भो ॥।६

कमठ की पीठि जाके गोडनि की गाड मानो,

नाप के भाजन भरि जल निधि जल भो ।

जातुधान-दावन परावन को दुर्ग भयो,

महामीन बास तिमि तोमनि को थल भो ॥

कुम्भकरन-रावन पयोद-नाद-ईधन को,

तुलसी प्रताप जाको प्रबल अनल भो ।

भीषम कहत मेरे अनुमान हनुमान,

सारिखो त्रिकाल न त्रिलोक महाबल भो ।।७

दूत रामराय को, सपूत पूत पौनको,

तू अंजनी को नन्दन प्रताप भूरि भानु सो ।

सीय-सोच-समन, दुरित दोष दमन,

सरन आये अवन, लखन प्रिय प्रान सो ।।

दसमुख दुसह दरिद्र दरिबे को भयो,

प्रकट तिलोक ओक तुलसी निधान सो ।

ज्ञान गुनवान बलवान सेवा सावधान,

साहेब सुजान उर आनु हनुमान सो ।८|

दवन-दुवन-दल भुवन-बिदित बल,

बेद जस गावत बिबुध बंदीछोर को ।

पाप-ताप-तिमिर तुहिन-विघटन-पटु,

सेवक-सरोरुह सुखद भानु भोर को ।।

लोक-परलोक तें बिसोक सपने न सोक,

तुलसी के हिये है भरोसो एक ओर को ।

राम को दुलारो दास बामदेव को निवास,

नाम कलि-कामतरु केसरी-किसोर को ।।९॥।

महाबल-सीम महाभीम महाबान इत,

महाबीर बिदित बरायो रघुबीर को ।

कुलिस-कठोर तनु जोरपरै रोर रन,

करुना-कलित मन धारमिक धीर को ।।

दुर्जन को कालसो कराल पाल सज्जन को,

सुमिरे हरनहार तुलसी की पीर को ।

सीय-सुख-दायक दुलारो रघुनायक को,

सेवक सहायक है साहसी समीर को ।।१०।।

रचिबे को बिधि जैसे, पालिबे को हरि,

हर मीच मारिबे को, ज्याईबे को सुधापान भो ।

धरिबे को धरनि, तरनि तम दलिबे को,

सोखिबे कृसानु, पोषिबे को हिम-भानु भो ।।

खल~दुःख दोषिबे को, जन-परितोषिबे को,

मांगिबो मलीनता को मोदक सुदान भो ।

आरत की आरति निवारिबे को तिहूं पुर,

तुलसी को साहेब हठीलो हनुमान भो ॥११॥।

सेवक स्योकाई जानि जानकीस मानै कानि,

सानुकरूल सूलपानि नवै नाथ नांक को ।

देवी देव दानव दयावने ह्वै जोर हाथ,

बापुरे बराक कहा और राजा रांक को ।।

जागत सोवत बैठे बागत बिनोद मोद,

ताके जो अनर्थ सो समर्थ एक आंक को ।

सब दिन रुरो पर पूरो जहां-तहां ताहि,

जाके है भरोसो हिये हनुमान हांक को ॥१२॥।

सानुग सगौरि सानुकरूल सूलपानि ताहि,

लोकपाल सकल लखन राम जानकी ।

लोक परलोक को बिसोक सो तिलोक ताहि,

तुलसी तमाइ कहा काहू बीर आनकी ॥।

केसरी किसोर बन्दीछोर के नेवाजे सब,

कीरति बिमल कपि करुनानिधान की ।

बालक-ज्यों पालिहैं कृपालु मुनि सिद्ध ताको,

जाके हिये हुलसति हांक हनुमान की ।।१३।।

करुनानिधान, बलबुद्धि के निधान मोद-

महिमा निधान, गुन-ज्ञान के निधान हौ ।

बामदेव-रुप भूप राम के सनेही,

नाम लेत-देत अर्थ धर्म काम निरबान हौ ।

आपने प्रभाव सीताराम के सुभाव सील,

लोक-बेद-बिधि के बिदूष हनुमान हौ ।

मन की बचन की करम की तिहूं प्रकार,

तुलसी तिहारो तुम साहेब सुजान हौ ।॥१४॥।

मन को अगम, तन सुगम किये कपीस,

काज महाराज के समाज साज साजे हैं ।

देव-बंदी छोर रनरोर केसरी किसोर,

जुग जुग जग तेरे बिरद बिराजे हैं ।

बीर बरजोर, घटि जोर तुलसी की ओर,

सुनि सकुचाने साधु खल गन गाजे हैं ।

बिगरी संवार अंजनी कुमार कीजे मोहि,

जैसे होत आये हनुमान के निवाजे हैं ।॥९५॥

सवैया

जान सिरोमनि हौ हनुमान सदा जन के मन बास तिहार ।

कारो बिगारो मैं काको कहा केहि कारन खीझत हौं तो तिहार ॥।

साहेब सेवक नाते तो हातो कियो सो तहां तुलसी को न चारो ।

दोष सुनाये ते आगेहूं को होशियार हैं हों मन तौ हिय हारो ।।१६॥

तेरे थपे उथपै न महेस, थपै थिरको कपि जे घर घाले ।

तेरे निवाजे गरीब निवाज बिराजत बैरिन के उर साले ॥।

संकट सोच सबै तुलसी लिये नाम फट मकरी के से जाले ।

बूढ़ भये, बलि, मेरिहि बार, कि हारि परे बहुतै नत पाले ।।१७॥।

सिंधु तरे, बड़े बीर दले खल, जारे हैं लंक से बंक मवा से ।

तैं रनि-केहरि केहरि के बिदले अरि-कुजर छैल छवा से ॥।

तोसों समत्थ सुसाहेब सेई सहै तुलसी दुख दोष दवा से ।

बानर बाज ! बढ़े खल-खेचर, लीजत क्यों न लपेटि लवा-से ।।१८॥

अच्छ-विमर्दन कानन-भानि दसानन आनन भा न निहारो ।

बारिदनाद अकंपन कुभकरन्न-से कुजर केहरि-बारो ॥

राम-प्रताप-हुतासन, कच्छ, बिपच्छ, समीर समीर-दुलारो ।

पाप-तें साप-तें ताप तिहूं-तें सदा तुलसी कहूं सो रखवारो ।।१९॥

जानत जहान हनुमान को निवाज्यौ जन,

मन अनुमानि बलि, बोल न बिसारिये ।

सेवा-जोग तुलसी कबहुं कहा चूक परी,

साहेब सुभाव कपि साहिबी संभारिये ।।

अपराधी जानि कीजै सासति सहस भांति,

मोदक मरे जो ताहि माहुर न मारिये ।

साहसी समीर के दुलारे रघुबीर जू के,

बांह पीर महाबीर बेगि ही निवारिये ॥॥२०॥।

बालक बिलोकि, बलि बारेतें आपनो कियो,

दीनबन्धु दया कीन्हीं निरुपाधि न्यारिये ।

रावरो भरोसो तुलसी के, रावरोई बल,

आस रावरीयै दास रावरो बिचारिये ।।

बड़ो बिकराल कलि, काको न बिहाल कियो,

माथे पगु बलि को, निहारि सो निवारिये |

केसरी किसोर, रनरोर, बरजोर बीर,

बांहुपीर राहुमातु ज्यौ पारि मारिये ।।२२१॥।

उथपे थपनथिर थपे उथपनहार,

केसरी कुमार बल आपनो संभारिये |

राम के गुलामनि को कामतरु रामदूत,

मोसे दीन दूबरे को तकिया तिहारिये ।।

साहेब समर्थ तोसों तुलसी के माथे पर,

सोऊ अपराध बिनु बीर, बांधि मारिये ।

पोखरी बिसाल बांहु, बलि, बारिचर पीर,

मकरी ज्यौ पकरि कै बदन बिदारिये ॥२२॥

राम को सनेह, राम साहस लखन सिय,

राम की भगति, सोच संकट निवारिये ।

मुद-मरकट रोग-बारिनिधि हेरि हारे,

जीव-जामवंत को भरोसो तेरो भारिये ।।

कूदिये कृपाल तुलसी सुप्रेम-पव्बयते,

सुथल सुबेल भालू बैठि कैः बिचारिये ।

महाबीर बांकुरे बराक बांह-पीर क्यों न,

लंकिनी ज्यों लात-घात ही मरोरि मारिये ।॥२३॥।

लोक-परलोकटूं तिलोक न बिलोकियत,

तोसे समरथ चष चारिहूं निहारिये ।

कर्म, काल, लोकपाल, अग-जग जीवजाल,

नाथ हाथ सब निज महिमा विचारिये ॥।

खास दास रावरो, निवास तेरो तासु उर,

तुलसी सो देव दुखी देखियत भारिये |

बात तरुमूल बंहुसूल कपिकच्छरु-बेलि,

उपजी सकेलि कपिकेलि ही उखारिये ।॥२४॥।

करम-कराल-कंस भूमिपाल के भरोसे,

बकी बकभगिनी काहू ते कहा डरैगी ।

बड़ी बिकराल बाल घातिनी न जात कदि,

बहुबल बालक छबीले छोटे छरैगी ।।

आई है बनाइ बेष आप ही विचारि देख,

पाप जाय सबको गुनी के पाले परैगी ।

पूतना पिसाचिनी ज्यौ कपिकान्ह तुलसी की,

बोंहपीर महाबीर तेरे मारे मरगी ।॥२५॥

भालकी कि कालकी कि रोष की त्रिदोष की है,

बेदन विषम पाप ताप छल छांह की ।

करमन कूट की कि जन्त्र मन्त्र बूट की,

पराहि जाहि पापिनी मलीन मन मांह की ॥।

पैटहि सजाय, नत कहत बजाय तोहि,

बाबरी न होहि बानि जानि कपि नह की ।

आन हनुमान की दुहाई बलवान की,

सपथ महाबीर की जो रहै पीर बांह की ॥॥२६॥।

सिंहिका संहारि बल, सुरसा सुधारि छल,

लंकिनी पछारि मारि बाटिका उजारी है ।

लंक परजारि मकरी बिदारि बारबार,

जातुधान धारि धूरिधानी करि डारी है ।।

तोरि जमकातरि मंदोदरी कढ़ोरि आनी,

रावन की रानी मेघनाद महतारी है ।

भीर बांह पीर की निपट राखी महाबीर,

कौन के सकोच तुलसी के सोच भारी है ।।२७॥।

तेरो बालि केलि बीर सुनि सहमत धीर,

भूलत सरीर सुधि सक्र-रबि-राहु की ।

तेरी बांह बसत बिसोक लोकपाल सब,

तेरो नाम लेत रहै आरति न काहू की ॥

साम दान भेद बिधि बेदहू लबेद सिधि,

हाथ कपिनाथ ही के चोटी चोर साहु की ।

आलस अनख परिहास कै सिखावन है,

एते दिन रही पीर तुलसी के बाहु की ॥२८॥।

टूकनि को घर-घर डोलत केगाल बोलि,

बाल ज्यों कृपाल नतपाल पालि पोसो है ।

कीन्ही है संभार सार अंजनी कुमार बीर,

आपनो बिसारि हैं न मेरेहू भरोसो है ॥।

इतनो परेखो सब भोति समरथ आजु,

कपिराज सांची कहौं को तिलोक तोसो है ।

सासति सहत दास कीजे पेखि परिहास,

चीरी को मरन खेल बालकनि को सो है ।॥२९॥।

आपने ही पाप तें त्रिपात ते कि साप तें,

बढ़ी है बाह बेदन कही न सहि जाति है ।

ओषध अनेक जन्त्र मन्त्र टोटकादि किये,

बादि भये देवता मनाये अधिकाति है ।।

करतार, भरतार, हरतार, कर्म काल,

को है जगजाल जो न मानत इताति है |

चेरो तेरो तुलसी तू मेरो कल्यो राम दूत,

ढील तेरी बीर मोहि पीर तें पिराति है ।।३०॥

दूत राम राय को, सपूत पूत बाय को,

समत्व हाथ पाय को सहाय असहाय को ।

बांकी बिरदावली बिदित बेद गाइयत,

रावन सो भट भयो मुठिका के घाय को ॥

एते बड़े साहेब समर्थ को निवाजो आज,

सीदत सुसेवक बचन मन काय को ।

थोरी बांह पीर की बड़ी गलानि तुलसी को,

कौन पाप कोप, लोप प्रकट प्रभाय को ।।३१॥।

देवी देव दनुज मनुज मुनि सिद्ध नाग,

छोटे बड़े जीव जेते चेतन अचेत हैं ।

पूतना पिसाची जातुधानी जातुधान बाम,

राम दूत की रजाइ माथे मानि लेत हैं ।।

घोर जन्त्र मन्त्र कूट कपट कुरोग जोग,

हनुमान आन सुनि छाडत निकेत हैं ।

क्रोध कीजे कर्म को प्रबोध कीजे तुलसी को,

सोधि कीजे तिनको जो दोष दुख देत हैं ।॥३२॥।

तेरे बल बानर जिताये रन रावन सों,

तेरे घाले जातुधान भये घर-घर के ।

तेरे बल रामराज किये सब सुरकाज,

सकल समाज साज साजे रघुबर के ॥

तेरो गुनगान सुनि गीरबान पुलकत,

सजल बिलोचन बिरंचि हरि हर के ।

तुलसी के माथे पर हाथ फेरो कीसनाथ,

देखिये न दास दुखी तोसो कनिगर के ।।३३॥।

पालो तेरे टूक को परेहू चूक मूकिये न,

कूर कौड़ी दूको हौं आपनी ओर हरिये ।

भोरानाथ भोरे ही सरोष होत थोरे दोष,

पोषि तोषि थापि आपनी न अवडेरिये ।।

अबु तू हौ अंबुचर, अबु तू हों डिंभ सो न,

बूझिये बिलंब अवलंब मेरे तेरिये ।

बालक बिकल जानि पाहि प्रेम पहिचानि,

तुलसी की बांह पर लामी लूम फेरिये ।।३४॥।

घेरि लियो रोगनि, कुजोगनि, कुलोगनि ज्यौ,

बासर जलद घन घटा धुकि धाई है ।

बरसत बारि पीर जारिये जवासे जस,

रोष बिनु दोष धूम-मूल मलिनाई है ।।

करुनानिधान हनुमान महा बलवान,

हेरि हंसि होकि फूंकि फौजैं ते उड़ाई है ।

खाये हुतो तुलसी कुरोग राढ़ राकसनि,

केसरी किसोर राखे बीर बरिआई है ।।३५॥।

सवैया

राम गुलाम तु ही हनुमान गोसांई सुसांई सदा अनुकूलो ।

पाल्यो हौ बाल ज्यों आखर दू पितु मातु सों मंगल मोद समूलो ।।

बांह की बेदन बांह पगार पुकारत आरत आनंद भूलो ।

श्री रघुबीर निवारिये पीर रहौ दरबार परो लटि लूलो ।।३६॥।

घनाक्षरी

काल की करालता करम कठिनाई कर्थ,

पाप के प्रभाव की सुभाय बाय बावरे।

बेदन कुभांति सो सही न जाति राति दिन,

सोई बांह गही जो गही समीर डाबरे ।।

लायो तरु तुलसी तिहारो सो निहारि बारि,

सींचिये मलीन भो तयो है तिहूं तावरे ।

भूतनि की आपनी पराये की कृपा निधान,

जानियत सबही की रीति राम रावरे ।॥३७॥।

पंय पीर पेट पीर बह पीर मुंह पीर,

जरजर सकल पीर मई है ।

देव भूत पितर करम खल काल ग्रह,

मोहि पर दवरि दमानक सी दई है ।।

हौ तो बिनु मोल के बिकानो बलि बारेही तें,

ओट राम नाम की ललाट लिखि लई है ।

कुंभज के कंकर बिकल बूढ़े गोखुरनि,

हाय राम राय ऐसी हाल कहूं भई है ।।३८॥।

बाहुक-सुबाहु नीच लीचर-मरीच मिलि,

मुंहपीर केतुजा कुरोग जातुधान हैं ।

राम नाम जगजाप कियो चहों सानुराग,

काल कैसे दूत भूत कहा मेरे मान हैं ।।

सुमिरे सहाय राम लखन आखर दोऊ,

जिनके समूह साके जागत जहान हैं ।

तुलसी संभारि ताडका संहारि भारि भट,

बेधे बरगद से बनाइ बानवान हैं ।॥३९॥।

बालपने सूथे मन राम सनमुख भयो,

राम नाम लेत मांगि खात टूकटाक हां ।

परयो लोक-रीति में पुनीत प्रीति राम राय,

मोह बस बैठो तोरि तरकि तराक हौ ॥।

खोटे-खोटे आचरन आचरत अपनायो,

अंजनी कुमार सोध्यो रामपानि पाक हौ ।

तुलसी गुसांई भयो भोंडे दिन भूल Gयो,

ताको फल पावत निदान परिपाक हौं ।॥४०॥।

असन-बसन-हीन बिषम-बिषाद-लीन,

देखि दीन दूबरो करै न हाय हाय को ।

तुलसी अनाथ सो सनाथ रघुनाथ कियो,

दियो फल सील सिंधु आपने सुभाय को ॥।

नीच यहि बीच पति पाइ भरु हाईगो,

बिहाइ प्रभु भजन बचन मन काय को |

ता तें तनु पेषियत घोर बरतोर मिस,

फूटि फूटि निकसत लोन राम राय को ।।४२१॥।

जीओं जग जानकी जीवन को कहाइ जन,

मरिबे को बारानसी बारि सुरसरि को ।

तुलसी के दुहूं हाथ मोदक हैं ऐसे ठांउ,

जाके जिये मुये सोच करिहैं न लरि को

मोको झूटो सांचो लोग राम को कहत सब,

मेरे मन मान है न हर को न हरि को ।

भारी पीर दुसह सरीर ते बिहाल होत,

सोऊ रघुबीर बिनु सके दूर करि को ।४२॥।

सीतापति साहेब सहाय हनुमान नित,

हित उपदेश को महेस मानो गुरु कै ।

मानस बचन काय सरन तिहारे पाय,

तुम्हरे भरोसे सुर मैं न जाने सुर कै ।।

व्याधि भूत जनित उपाधि काहु खल की,

समाधि कीजे तुलसी को जानि जन फुर कै ।

कपिनाथ रघुनाथ भोलानाथ भूतनाथ,

रोग सिंधु क्यों न डारियत गाय खुर कैः ।।४३॥।

कहों हनुमान सों सुजान राम राय सों,

कृपानिधान संकर सों सावधान सुनिये ।

हरष विषाद राग रोष गुन दोष मई,

बिरची बिरञ्ची सब देखियत दुनिये ।।

माया जीव काल के करम के सुभाय के,

करैया राम बेद कहैं सांची मन गुनिये ।

तुम्ह तं कहा न होय हा हा सो बुझैये मोहि,

हौ हूं रहों मौनही बयो सो जानि लुनिये ।।४४॥।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

क्या कोई भी हनुमान बाहुक का पाठ कर सकता है?

हाँ, कोई भी व्यक्ति पूरी श्रद्धा, पवित्रता और विश्वास के साथ हनुमान बाहुक का पाठ कर सकता है। इसके लिए किसी कठिन नियम की आवश्यकता नहीं होती।

शारीरिक कष्टों के लिए कितने दिनों तक पाठ करना चाहिए?

यदि आप किसी पुरानी बीमारी या जोड़ों के दर्द से परेशान हैं, तो लगातार 21 दिनों या 40 दिनों तक नियम से इसका पाठ करना बहुत लाभकारी माना जाता है।

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